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"ये है राजधानी ना बिजली ना पानी"

Posted On: 23 Jun, 2012 में

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“ये है राजधानी ना बिजली ना पानी”
देश की राजधानी दिल्ली कभी हिन्दुस्तान का दिल कहलाता था पर हालात अब यह हैं कि उस दिल में अंधेरो का साम्राज्य हो गया है। लोग पानी की एक-एक बूंद के लिए तरस रहें हैं |जगह-जगह कड़ी धूप और गरम लू के थपेड़ों को खाकर जनता प्रदर्शन कर रही हैं पर सरकार के कानों पर जूं तक नहीं रेंग रही हैं|हां इतना जरुर हुआ है कि दिल्ली की मुख्य -मंत्री श्रीमती शीला दीक्षित आधी बाल्टी पानी से नहाने लगी हैं |और जनता के सामने बयान देतीं हैं कि पानी की इतनी भी दिक्कत नहीं हैं जितना लोगों ने हाय तौबा मचाया हुआ है।मुख्य-मन्त्री जी उन जगहों पर कभी शायद जातीं ही नहीं हैं जहां लोगों को पानी के टैंकरो का बेसब्री से इन्तज़ार रहता है,वो भी तीन दिनों में एक वार आता हैपूरे इलाके में अफरातफरी मच जाती सारे काम छोड लोग बाल्टियाँ डिब्बे लेकर लाईन में लग जातें हैं।कई वार झगडे मारपीट तक की घटनायें होतीं हैं,लोग पानी की टेन्शन में अपने पडौसियों के खून के प्यासे भी बन जातें हैं।दिल्ली की७५ प्रतिशत जनता ऎसे ही अपनी प्यास बुझाने के लिये संघर्ष कर रही है।ऊचें पदों पर बैठै नेताओं को ज़मीनी हकीकत का कुछ पता नहीं हैं।और अपनी जिम्मेदारी को भी नहीं समझते।नेताजी जो लोग पानी की एक-एक बूंद के प्यासे हैं उनसे यदि मिलें तो शायद खुद ही शर्म से पानी-पानी हो जायें।
शीला जी राजधानी की जनता इतनी मेहनत करती है रात दिन पसीना बहाती है,अपने अधिकारों के लिए धरना प्रदर्शन करती है ,आये दिन जंतर -मंतर पर मटके फोड़ती है,अब जनता रेत से स्नान कर आपको जता रही है कि देश की राजधानी में पानी की जगह रेत और मिट्टी नहाने के लिए हाज़िर है|आप आधी बाल्टी से नहा कर राजधानी बासियों पर एहसान कर रहीं है|पानी की काफी बचत कर रहीं है,पर सोचिये जो मजदूर पूरे दिन धूप में तच कर पसीना बहाता है,हाड्तोड मेहनत कर बोझा उठा कई-कई मन्जिलों पर चढता है- रात को घर जाकर उसे पीने के लिए पानी और खाने के लिए सूखी रोटी तो चाहिए ही |और शरीर की गन्दगी दूर करने के लिए कमसे कम दो बाल्टी पानी चाहिए ही होगा |राजधानी में बिजली पानी का जो बदतर हालात है ऐसे में राजनेताओं के बलिदान भरे बयान जले पर नमक का काम करतें हैं |दरअसल उन्हें पता ही नहीं अभाव और समस्या किस चिड़िया का नाम है| मुँह में सोने की चम्मच लेकर पैदा होने वाले को पावर्टी और ,गरीबी का असली रूप कंहा पता होगा ?एसी गाडियों में चलना,एसी रूम में सारी गर्मियाँ बिताना, शानोशौकत-सभी तरह की सुख-सुविधाओं में रहने वालों को झोपडी वालों के दर्द का क्या पता होगा?
पानी का जो हाल है राजधानी में वहां तो मेरे हिसाब से नेताओं को अपनी जिम्मेदारियों को समझते हुए नहाना ही नहीं चाहिए |सारा पानी मजदूरों गरीबों और जाम में फंसे मोटर साईकिल,स्कूटर,साइकिल सवारों,नानएसी गाडियों में सफर करने वाले लोयर मिडिल क्लास एडी-चोटी तक पसीने में नहाए लोगों के लिए छोड़ देना चाहिए।राजधानी की महिलायें भी पानी की समस्या से पीडित हैं।उनका काफी समय पानी की व्यवस्था करने में बर्बाद हो रहा है। रातों की नींद कुर्बान कर सुबह के लिए अपर्याप्त पानी ही जुटा पाती है।पूरा दिन पानी की प्रतीक्षा में सूखे नलों को देखते गुज़रता है और रात को बिज़ली की आखँमिचौली चैन से सोने नहीं देती।
बिज़ली का हाल भी राजधानी में खून के आँसू रुलाने वाला है।दिन और रात में कई-कई घन्टों के लिये अन्धेरों और भीषण गर्मी से जूझना पड्ता है।बच्चों की स्कूल की छुट्टियां चल रहीं हैं।कुछ इस्पेशल की इच्छा रखतें हैं।खाने में किचन में यदि कुछ बिज़ली उपकरण इस्तेमाल करने हैं तो सुबह से ही बिज़ली कटौती शुरु हो जाती है।आजकल घरों में बाशिंग मशीन,टीवी.कम्प्यूटर,ऎ.सी.मिक्सी,ओबन आदि काफी प्रचलन में हैं।बिज़ली की अघोषित कटौती से पूरे दिन का रुटीन ही गड्बडा जाता है।एक ओर तो जनता बिजली का भरपूर फायदा नहीं उठा सकती,दूसरी ओर बढ्ती बिज़ली की निरन्तर बढ्ती हुई दरें आम आदमी के घरों का बज़ट बिगड देतीं हैं।सुना है राजधानी-बासियों को अगले महीने ही बिज़ली का एक और बडा झटका सहने को तैयार होना होगा।
इसी सिलसिले में मुझे एक बड़े नेता से अपनी भडास निकालने का मौका मिल गया|मैंने उनसे कहा कि”अगला युग लालटेन या साइकिल का आने वाला है “सुन कर वो आग बबूला हो गये|दरसअल वो समझे कि मै लालू प्रसाद यादब और मुलायम सिंह या अखिलेश यादव की समर्थक हूँ और उनका प्रचार करने आई हूँ |किसी तरह उन्हें शांत कर समझाया कि बिजली का यही हाल रहा तो लालटेन का ही आख़िरी सहारा होगा |फिर पैट्रोल के दामों में जिस तरह आये दिन बढ़ोत्तरी हो रही है आम आदमी साइकिल की सबारी ही करेगा |इसमें लालू और मुलायम की बात कहां से आपके दिमाग कहां से आ गई ?सच तो यही है इन नेताओं के दिमाग में हर समय बस अपने प्रतिद्विन्द्वियो का ही नाम गूजता रहता है|देश का क्या हाल है यह तो कुछ समय के लिए जब चुनाव में जनता का बोट चाहिए होता है तभी जानने की इन्हें हसरत होती है |

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