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"महिलाओं के जीवन का दर्दनाक अंत-दोषी कौन?अति महत्वाकांक्षा या पुरुष प्रधान रवैया?"

Posted On: 27 Aug, 2012 Others में

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“महिलाओं के जीवन का दर्दनाक अंत-दोषी कौन?अति महत्वाकांक्षा या पुरुष प्रधान रवैया?”
महिलाओं के जीवन की सबसे बडी कमजोरी रहा है उनका अति संवेदनशील,ममतामयी छवि।पुरुषों को उनकी इसी विशेषता में अपना स्वार्थ पूरा करने का पूरा अवसर मिलता है।आज भी हमारा समाज महिलाओं को उनको एक परम्परागत रुप में ही ज्यादा पसन्द करता है।सपने देखना एक सहज और स्वभाविक मानवीय प्रवृति है,और सपनों का संसार सज़ाने वाली आंख पुरुष या स्त्री किसी की भी हो सकती है।इसमें कुछ बुरा भी नहीं हैं।अति महत्त्वाकांक्षायें इन्सान की सोचने समझने की शक्ति को कुप्रभावित करती है,कदाचित इसीलिये कहा जाता है कि अति तो हर क्षेत्र में बुरी ही रहती है।भावनाओं पर संतुलन और अपनी कमान जितनी कसी होगी ज़िन्दगी में खतरे उतने ही कम आयेगें।जीवन में कुछ अवांक्षित घट जाता है तो सबसे ज्यादा नुकसान औरत को भोगना पडता है।प्रश्न उठता है जब एक पुरुष और एक स्त्री दोनो मिलकर गुनाह या गलत राहों पर साथ-साथ चलतें हैं तो समाज़ सिर्फ औरत पर ही अपनी उंगलियां क्यों उठाता है?अन्त में एक औरत या लड्की ही शहीद या कुर्बान क्यों होतीं हैं ? समाज में मासूम ,महत्त्वाकांक्षी युवतियों की भावनाओं से खेल कर अपनी हवस पूरी करना और अपना हक या कुछ भी खिलाफ बोलने पर कत्ल जैसे जघंन्य अपराधों से हमारा सामना प्रतिदिन होता रहता है।कमउम्र और मासूम भोली लडकियों के नेताओं के ज़ाल में फंसने और ह्त्या या आत्महत्या करने के किस्से अब काफी घट्ने लगें हैं।कम समय में ज़्यादा फेम और पैसा युवाओं को लुभाता है। अनुभव हीन फिसलन भरी नाज़ुक उम्र इन्हें अपनी महत्त्वाकांक्षाओं को हर हाल में पूरा करने के लिये लुभातीं हैं।पर विचार्णीय है कि ऎसी ऊचाइयां किस काम की जिनसे खुद का ज़ीवन ही सुरक्षित ना रहें?सबसे ज़रुरी है हमारा ज़ीवन।हमें यह मान कर भी चलना होगा कि इन युवाओं के परिज़न भी काफी हद तक ऎसी घटनाओं के लिये दोषी हैं।युवाओं में ज़ोश के साथ होश की कमी रहती है,कम मेहनत में ज़्यादा पाने की अनुभवहीनता स्वभाविक है,पर उस समय उन के परिज़न चुप्पी क्यों साधे रहतें हैं? परिजन कुछ बुरा होने के बाद क्यों बोलतें है?पानी सिर से गुज़रने की प्रतीक्षा क्यों करतें हैं?
महिलाओं को हर ज़गह खतरे ही खतरे हैं। समाज़ सदियों से पूर्वाग्रहों से भरा मर्द प्रधान रहा है।खुद को उन खतरों से कैसे सुरक्षित रखें ये युवतियों को सीखना होगा।मालूम होता ही है कि हर ज़गह पैसा और रुतवा ही काम आता है।कितने अपराध करके भी नेता और ऊची पहुच वाले आराम से छूट जातें हैं। कानून इनके लिये एक खिलौना है अपने पैसे और पहुँच के रहते वो साफ बच जातें है हमारा कानून अन्धा है उसमें बहुत से ऎसे पतले गलियारे हैं जिनसे गुज़र कर अपराधी बडे आराम से अपने आप को बचा ले जाता है।बिड्म्बना ही कहा जायेगा कि अब ऎसी हृदय विदारक घट्नाओं से हमारा सामना रोज ही होने लगा है,और उससे भी बुरा है कि समाज में ऎसी घट्नाओं पर उदासीनता और संवेदनहीनता का माहौल।कुछ समय के लिये मीडिया और अखवारों में सुर्खियां पाने के बाद सब कुछ भुला दिया जाता है।सफेद पोशाक में छुपे इन शातिर दरिन्दों ने कितनी ही मासूम कलियों को खिलने से पहले ही तबाह कर दिया।देश की राजधानी नैना साहनी को तंदूर में जलता हुआ देख चुकी है,मधुमिता का दुखद अन्त कहें या मुँह खोलने की सज़ा मिली,और अब देखतें है वही सब कुछ फिर से इतिहास दोहराया जायेगा।पुलिस,अदालत,तारीखें,गवाहों का मुकरना,और हंसता हुया कथित अपराधी बाइज्जत बरी हो चौडी छाती फुला कर कोर्ट से बाहर आता है।चेहरे पर गुनाह की शिकन तक नहीं,दिल में अपराध बोध ही नही, ऎसे में यही माना जा सकता है कि ये लोग जान बूझ कर गल्तियां करतें हैं।स्वभाविक है अगले शिकार की तलाश में इनकी नज़रें जुट जातीं हैं।
सबसे बडा सबाल है हर वार शहीद होती है औरत?औरत की सबसे बडी कमजोरी है उसकी भावुकता-ममता और नई पीढी की महत्त्वा- कांक्षा।जिससे शिकारी बडी आसानी से अपना अस्त्र बना उसे इस्तेमाल करता है और जब जी भर गया तो मरने पर विवश कर दिया जाता है।युवतियों को समझना होगा कि मरना किसी समस्या का हल नहीं हैं।सबसे ज़रुरी है अपने ज़ीवन का मूल्य समझना और अपनी कमज़ोरी और भावुकता पर अंकुश लगाना।उसके बाद अपराधी को पक्के सबूतों के साथ फांसी के तख्ते तक ले जाना ही उनका लक्ष्य होना चाहिये ताकि उनके साथ जो भी बुरा घटित हुआ उससे लोगों को सबक मिले।एक और मासूम का जीवन उनकी तरह तबाह होने से बचाया जा सके।
पुनीता सिह

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